Kabir Ke Dohe In Hindi PDF | कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित

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Kabir Ke Dohe In Hindi PDF | कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित, नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का एक बार फिर हमारी Website Be RoBoCo में, आज एक बार हम फिर हाजिर हैं आपके लिए एक महत्वपूर्ण जानकारी को लेकर जिसे हम Kabir Ke Dohe In Hindi PDF | कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित के नाम से जानते हैं।


दोस्तो क्या आपने भी Kabir Ke Dohe PDF, Kabir Dohe In Hindi, Sant Kabir Ke Dohe और Kabir Das Ji Ke Dohe आदि के बारे में Search किया है और आपको निराशा हाथ लगी है ऐसे में आप बहुत सही जगह आ गए है, आइये Kabir Ke Dohe Class 7, Kabir Saheb Ke Dohe,  Kabir Ke Dohe Ko Kis Naam Se Jana Jata Hai और Kabir Books In Hindi ​आदि के बारे में बुनियादी बाते जानते है।


कबीर दास जी 15वीं सदी के भारतीय संत थे। उनकी रचनाएँ, जो कविताओं और गीतों के रूप में हैं, आज भी व्यापक रूप से लोकप्रिय हैं। उनकी शिक्षाएं प्रेम, सहिष्णुता और समझ की आवश्यकता पर जोर देती हैं, और कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही हैं। कबीर दास को भारत में हिंदी भाषा के प्रयोग को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी दिया जाता है। 


अगर आप उनके कुछ प्रसिद्ध संकलन को पढ़ना चाहते है और हमारे इस लेख पर आ गए है तो लेख के अंत तक बने रहे। आपको कबीर के दोहे से जुड पूरी जानकारी मिलेंगी, चलिए शुरू करते है।

 

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Kabir Ke Dohe In Hindi PDF | कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित


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कबीर दास जी का जन्म मुस्लिम बुनकरों के परिवार में हुआ था और उनका प्रारंभिक जीवन सूफी मनीषियों और हिंदू संतों की संगति में बीता था। कबीर ने प्रेम और सहिष्णुता का संदेश दिया और उनकी कविता को आज भी कई लोग पूजते हैं। कबीर दास जी ने समाज में फैली कुरीतियों पर भारी चोट की। समाज मे व्याप्त बाह्य आडंबरो को तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम सभी धर्मों को एक साथ मिलकर रहने की शिक्षा दी है।

 

वह पंडितों से कहते हैं थे कि 

 

"पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहाड़।

तातौं तो चाकी भली, पीस खाए संसार॥"

 

इसका अर्थ यह है कि पाहन अर्थात पत्थर को पूजने से यदि हरी (भगवान) मिलते हैं तो मै पहाड़ की पूजा करूंगा क्योंकि वह बहुत विशाल है और उसमे अनेक पत्थर है जिससे मुझे ढेर सारे भगवान और प्रभु मिल सकते हैं और यदि पत्थर पूजने से हरी नहीं मिलते हैं तो इससे तो चक्की भली है जिसमें अन्न को पीसा जाता है।

 

वह मुसलमानो से कहते हैं थे कि

 

"काँकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाए।

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥"

 

कबीर दास जी कहते है कि कंकर पत्थर जोड़ कर मस्जिद बना ली और उसके उपर चढ़कर मुल्ला जोर जोर से चीख कर अजान देता है। कबीर दास जी कहते है कि क्या खुदा बहरा हो गया है?

 

इसप्रकार आपने देखा कि कबीरदास जी विभिन्न प्रकार के आडंबर और कर्मकांड के प्रबल विरोधी थे। उनका स्पष्ट मत था कि व्यर्थ के कर्मकांड और आडंबरो में ना पड़कर अपने हृदय में हरि को ढूंढना चाहिए।

 

Kabir Books In Hindi

 

कबीर दास पढ़े-लिखे नहीं थे। कबीर के द्वारा गाई जाने वाली सभी साखियाँ (दोहे) एवं पद उनके अनुयायियों और श्रोताओं द्वारा लिखित है। कबीर के प्रमुख ग्रंथों के नाम इस प्रकार है।

 

1. कबीर बीजक

 

इसके तीन भाग है।

 

  • साखी (साक्षी)
  • सबद (शब्द)
  • रमैनी (रामायण)

 

2. कबीर साखी

3. कबीर शब्दावली

4. कबीर दोहवाली

5. कबीर ग्रंथावली

6. कबीर सागर

7. अनुराग सागर

8. संतबानी संग्रह

 

Kabir Ke Dohe In Hindi PDF

 

कबीर दास जी को उनके दोहों के कारण आज भी बहुत याद किया जाता है। कबीर दास जी की भाषा सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी है। इनकी भाषा में हिंदी भाषा की सभी बोलियों जैसे राजस्थानी, हरयाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी, ब्रजभाषा आदि के शब्द सम्मिलित थे। कबीर दास जी के दोहों में बहुत ही गहराई और सच्ची बाते होती है। 

 

अगर आप ऊपर बताए गए उनके दोहों के संग्रह को PDF Format में पढ़ना चाहते है तो Kabir Ke Dohe In Hindi PDF को डाउनलोड करने से सम्बन्धित जानकारी आपको पेज के अंत मे मिल जायेगी तो लेख के अंत तक बने रहे।

 

कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित

 

कबीर ने गुरु को ईश्वर से भी अधिक महत्व दिया था। उनका मानना था कि गुरु का काम है समाज में प्रचलित अज्ञानता और विसंगतियों को दूर करना और एक बेहतर समाज के निर्माण में अपना योगदान करना। गुरु की महत्ता को बताने वाले उनके कुछ प्रसिद्ध दोहों की अर्थ सहित व्याख्या इस प्रकार है।

 

"गुरु गोविंद दोउ खड़े काको लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंन्द दियो बताय।।"

 

कबीर दास जी की यह दोहा गुरु की महिमा का वर्णन करता है। इस दोहे के माध्यम से कबीर दास जी ने स्पष्ट किया है कि यदि जीवन में कभी ऐसी परिस्थिति आ जाये कि गुरु और गोविन्द (ईश्वर) एक साथ खड़े हो तो पहले किसे प्रणाम करना चाहिए? तो गुरु ने ही गोविन्द से हमारा परिचय कराया है इसलिए गुरु का स्थान गोविन्द से भी ऊँचा है।

 

"कबीर, गुरू बिना माला फेरते, गुरू बिना देते दान।

गुरू बिन दोनों निष्फल है, चाहे देखो वेद पुराण।।"

 

कबीर दास जी ने कहा है कि एक साधक को चाहिए कि पहले वह पूर्ण गुरू से दीक्षा ले। फिर उनको दान करे। उनके बताए मंत्रों का जाप (स्मरण) करे। गुरूजी से दीक्षा लिए बिना भक्ति के मंत्रों के जाप की माला फेरना तथा दान करना व्यर्थ है। इसलिए गुरू बनाना अति आवश्यक है। इसी गुरु परंपरा को कायम रखने के लिए कबीर दास जी ने स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु बनाया।

 

"काल करै सो आज कर, आज करे सो अब। 

पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब।।"

 

उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीर दास जी यह संदेश देते है कि जो काम व्यक्ति को कल करना है, अगर संभव हो तो उसे आज ही कर लो। काम को टालना ठीक नहीं है क्योंकि समय का भरोसा नहीं है और यह पलभर में कभी भी प्रलय को ला सकता है तो हो सकता है कि वापस अपने काम को करने का मौका ही ना मिले।

 

"दुख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।

जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय॥"

 

कबीर साहेब जी कहते हैं कि भगवान की याद लोगो को दुःख के समय ही आती हैं। जब विपत्तियों का पहाड़ होता है तब ही व्यक्ति भगवान को याद करता है, पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए उनका सुमिरन किया जाय तो दुःख आएगा ही क्यों

 

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।"

 

कबीर दास जी बोलते है कि इस संसार में जब मैंने बुराई को ढूँढा तो मुझे कहीं नहीं मिली। पर जब मैंने अपने मन के भीतर झाँका तो मुझे खुद से बुरा इंसान नहीं दिखा। जो दुसरो में बुराई ढूंढते है वास्तव में वहीँ सबसे बड़ी बुराई है।

 

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।"

 

कबीर दास जी कहते है कि उच्च ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी हर कोई विद्वान् नहीं हो जाता। अक्षर ज्ञान होने के बाद भी अगर उसका महत्त्व ना जान पाए, ज्ञान की करुणा को जो जीवन में न उतार पाए तो वो अज्ञानी ही है लेकिन जो प्रेम के ज्ञान को जान गया, जिसने प्यार की भाषा को अपना लिया वह बिना अक्षर ज्ञान के विद्वान हो जाता है।

 

"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।।"

 

कबीर दास जी कहते हैं कि इस दुनियाँ में जो भी करना चाहते हो वो धीरे-धीरे होता हैं अर्थात कर्म के बाद फल क्षणों में नहीं मिलता जैसे एक माली किसी पौधे को जब तक सौ घड़े पानी नहीं देता तब तक ऋतू में फल नही आता। धैर्य धारण करते हुए जीवन को जीना चाहिए।

 

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।"

 

कबीर दास जी कहते है कि जाति के माध्यम से किसी  भी व्यक्ति के ज्ञान का बोध नहीं किया जा सकता इसलिए किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है उसका ज्ञान और व्यवहार ही अनमोल है। जैसे किसी तलवार का अपना महत्व है पर म्यान का कोई महत्व नहीं, म्यान महज़ उसका उपरी आवरण है।

 

"बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।"

 

कबीर दास जी कहते है कि बोली का कोई मोल नहीं है। आपके बाण रूपी बोल किसी के हृदय को छलनी भी कर सकते है। इसलिए इन्हें बिना सोचे-समझे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बोलने के पहले ही सोच लेना चाहिए कि हम क्या कहने जा रहे है।

 

"चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।

जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥"

 

कबीर ने इस दोहे के माध्यम से कहा है कि संसार मे किसी को कुछ पाने की इच्छा हैं और पा लेने के बाद उसको खो देने की चिंता हैं। वह हर पल बैचेन हैं जिसके पास खोने को कुछ हैं। लेकिन इस दुनियाँ में वही खुश हैं, वही राजा है जिसके पास कुछ नहीं, उसे खोने का डर नहीं, उसे पाने की चिंता नहीं।

 

"माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥"

 

मिट्टी एक दिन कुम्हार से कहती हैं कि तू क्या मुझे कूट कूट कर आकार दे रहा हैं। एक दिन आएगा जब तू खुद मुझमें मिल कर निराकार हो जायेगा। समय सबसे बलवान होता है और समय की गति से ही परिणाम तय होते हैं। सब समय का ही खेल है इसलिए किसी को भी अभिमान नहीं करना चाहिए, काल किसी को छोड़ने वाला नहीं है।

 

"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।

कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर॥"

 

कबीर दास जी कहते हैं कि कोई व्यक्ति सालो से घंटो - घंटो तक हाथ में मोती की माला लेकर घुमाता  रहता है, लेकिन फिर भी उनका मन शांत नहीं होता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर अपने मन को टटोलो और उसकी सुनो, तुझे अपने आप ही शांति महसूस होने लगेगी।

 

"तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय।

कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय।।"

 

कबीर दास जी कहते हैं कि तिनके को पाँव के नीचे देखकर उसकी निंदा मत करिये क्योंकि जब वही तिनका उड़ कर आँख में चला जाये तो बहुत कष्टदायी हो जाता हैं अर्थात जीवन के क्षेत्र में किसी को भी तुच्छ अथवा कमजोर समझने की गलती ना करे। जीवन के क्षेत्र में कब कौन क्या कर जाये कहा नहीं जा सकता।

 

Top 10 Famous Kabir Saheb Ke Dohe

 

1. बड़ा हुवा तो क्या हुवा जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।

 

2. पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

 

3. जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान।

मोल करो तलवार का पड़ा रहने दो मियान।।

 

4. माया मरी न मन मरा मर मर गए शरीर।

आशा तृष्णा ना मरी केह गए दास कबीर।।

 

5. मांगन मरन समान है मत मांगो कोई भीक।

मांगन से मरना भला ये सद्गुरु की सीख।।

 

6. सहज मिले सो दूध समान, मांगा मिले सो पानि।

कहे कबीर वह रक्त समान, जामें ऐचातानि।।

 

7. बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय।

जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।।

 

8. काल करे सो आज कर आज करे सो अब।

पल में परलय होएगी बहुरि करोगे कब।।

 

9. ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय।

औरन को सीतल करे आपहु सीतल होय।।

 

10. कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर।

ना काहु से दोस्ती ना काहु से बैर।।

 

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आपने क्या सीखा

 

उपरोक्त लेख Kabir Ke Dohe In Hindi PDF | कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित के माध्यम से मैंने आपको Kabir Ke Dohe PDF, Kabir Dohe In Hindi, Sant Kabir Ke Dohe और Kabir Das Ji Ke Dohe, Kabir Ke Dohe Class 7, Kabir Saheb Ke Dohe,  Kabir Ke Dohe Ko Kis Naam Se Jana Jata Hai और Kabir Books In Hindi आदि के बारे में बताया है।

 

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